gav ki yade
प्यारे थे सबलोग मेरे अपने गाव में .
अक्सर गुजारी मेरी शामे पीपल की छाव में .
कभी खेल में खिलता था मन तो .
कभी खिल उठता था ख़त लिखकर.
खतो में भी कैसे कैसे मनोभाव होते थे
मनोभाव का भी स्याही से मेल होता था .
इस तरह से ख़तम आपना खेल होता था
कुछ बणे हुए तो ख़त का ख्याल छूता .
धीरे- धीरे गाव का मलाल छूता .
कुछ और दिन बीते चीजे बदल गईं .
जिनसे गाव , गाव था वो भी चली गई .
न समय रहा न दिल की वो दौलत रही .
दिन गुजर जाते है भागते कही से कही .
सुना है वो आई है गाव में घुमने .
सुनकर हम भी लगे मन ही मन झुमने .
मगर याद आते ही अपने परीछा का परिणाम .
बदलने पड़े आपने सारे नए प्रोग्राम .
शायद सारा वक्त का ही दोष था .
जब मुझे बोलना चाहिए था तब खामोश था .
यादों के वातायन में...बढ़िया कविता!
ReplyDelete