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HAMARI NAITIKTA
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हमारी सरकार कहती है शिक्षा जरुरी है . मगर बच्चो का शोसन इनकी मज़बूरी है . मैंने देखा एक बच्चा बेच रहा था अखबार वर्दी धारी ने कर दिया उसका एक पेपर बेकार . गुस्से से बच्चे ने उसकी तरफ देखा था पर लाचार होकर गस्से को फेका था . जनवरी का जाड़ा था , कपडा भी फटा था लेकिन पेपर लेकर वो स्टेशन पे डटा था . वर्दीवाले सुन्दर थे स्वस्थ भी अच्छा था पपेरवाला गरीब था ,मासूम था ,बच्चा था . वर्दी का पीछा किया सोचा कि उसे रोकू मगर मेरी औकात क्या कैसे वर्दी को तोकू . उसके पास वर्दी है ,स्वस्थ है,सरकार है एक तरफ कवि है, कमजोर है,बेरोजगार है . बाते अच्छी करते है ,प्रयोग में उतारते नहीं गलत करने वाले को शब्दों से भी मारते नहीं . यही हमारे नागरिक है,ऐसी ही सरकार है सोच तो अच्छा है पर व्यक्तित्व में विकार है ...
bachan ki soch
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वो दिन जब मै छत पर एक मेज पर बैठा सोच रहा था कि पहले मै बीए करुगा फिर ऍम ए फिर आइ ऐ यस बनुगा तथा समाज की सारे बुराइया ख़तम कर दुगा . और आज का दिन जब मैंने बीए भी कर लिया है एम भी पास हू फिर भी दुनिया देख कर और न् बदल पाने के कारन बहुत उदाश हू . मैंने नहीं सोचा था जब तक मै बुराइया ख़तम करने योग्य होउगा तब तक कुछ लोग बुरा करने वाले भी पैदा हो जाएगे . और शायद बुराई की जो परिभाषा है जिससे सरीफ लोगो को बड़ी आशा है बदल कर मेरी निराशा बन जाएगी और मुझे खुद बुरा बन्ने पर मजबूर कर देगी तथा मेरे बचपन की सोच को मुझसे बहुत दूर कर देगी ...
gav ki yade
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प्यारे थे सबलोग मेरे अपने गाव में . अक्सर गुजारी मेरी शामे पीपल की छाव में . कभी खेल में खिलता था मन तो . कभी खिल उठता था ख़त लिखकर. खतो में भी कैसे कैसे मनोभाव होते थे मनोभाव का भी स्याही से मेल होता था . इस तरह से ख़तम आपना खेल होता था कुछ बणे हुए तो ख़त का ख्याल छूता . धीरे- धीरे गाव का मलाल छूता . कुछ और दिन बीते चीजे बदल गईं . जिनसे गाव , गाव था वो भी चली गई . न समय रहा न दिल की वो दौलत रही . दिन गुजर जाते है भागते कही से कही . सुना है वो आई है गाव में घुमने . सुनकर हम भी लगे मन ही मन झुमने . मगर याद आते ही अपने परीछा का परिणाम . बदलने पड़े आपने सारे नए प्रोग्राम . शायद सारा वक्त का ही दोष था . जब मुझे बोलना चाहिए था तब खामोश था .